कंपनी का 'अंधेर नगरी' टूलबॉक्स: जहाँ स्क्रू ड्राइवर से मिट्टी खोदी जाती है!
कहते हैं कि एक समझदार कारीगर वो है जो सही काम के लिए सही औजार चुने। लेकिन हमारे कॉरपोरेट जगत में, खासकर कुछ ऐसी महान कंपनियों में जहाँ का मैनेजमेंट 'सब धान बाईस पसेरी' समझता है, वहाँ औजारों का एक अलग ही सर्कस चलता है।
यहाँ समस्या यह नहीं है कि कंपनी के पास औजार या टैलेंट नहीं हैं। समस्या यह है कि यहाँ के मालिकों और टॉप मैनेजमेंट को यह पता ही नहीं है कि स्क्रू ड्राइवर से पेंच कसा जाता है और खुरपी से मिट्टी खोदी जाती है!
आइए आज पर्दाफाश करते हैं इस 'महा-मिसमैनेजमेंट' का, जहाँ ₹50,000 की सैलरी वाले 'स्क्रू ड्राइवर' से ₹12,000 वाली 'खुरपी' का काम लिया जा रहा है, और जानते हैं कि ऐसी जगह काम करना आपके भविष्य के लिए कितना खतरनाक है।
1. जब मैनेजमेंट को हर औजार 'लोहे का टुकड़ा' नजर आए
इन कंपनियों के बॉस की नजर में कोई एम्प्लॉई 'स्पेशलिस्ट' नहीं होता। उनकी थ्योरी सिंपल है—"सैलरी दे रहे हैं ना? तो जो काम कहें, वो करो!"
उन्हें यह समझ ही नहीं आता कि:
- स्क्रू ड्राइवर (इंजीनियर/मैनेजर/डिज़ाइनर): यह एक सटीक, बारीक और डिज़ाइन ओरिएंटेड टूल है। इसका काम सिस्टम को सही जगह पर फिट करना, प्लानिंग करना और स्ट्रक्चर को मजबूती देना है।
- खुरपी (लो-लेवल टास्क/रूटीन लेबर): यह एक रफ-एंड-टफ टूल है, जिसका काम है रोजमर्रा की जमीनी खुदाई करना, जिसके लिए अलग से टेक्नीशियन या हेल्पर होने चाहिए।
जब आप ₹50,000 कमाने वाले एक क्वालिफाइड, सर्टिफाइड इंजीनियर को दिन भर बिठाकर साइट पर टूल्स उठवाएंगे, केबल खिंचवाएंगे या सिर्फ एक्सेल शीट में डेटा प्रविष्टि (Data Entry) करवाएंगे, तो आप असल में स्क्रू ड्राइवर को गमले में ठोक-ठोक कर उसकी चूड़ियां और नोक बर्बाद कर रहे हैं!
2. पैसा, समय और मेहनत की 'त्रिपक्षीय' बर्बादी
सही टूल का सही जगह इस्तेमाल न करने का नुकसान सिर्फ उस एम्प्लॉई को नहीं, बल्कि खुद कंपनी को होता है। लेकिन अनाड़ी मैनेजमेंट को यह गणित कभी समझ नहीं आता:
- पैसे की बर्बादी: जो काम ₹12,000 का टेक्नीशियन 2 घंटे में मुस्कुराते हुए कर सकता है, उसे करने के लिए आप ₹50,000 वाले इंजीनियर का पूरा दिन खराब कर रहे हैं। यानी काम की कॉस्टिंग चार गुना बढ़ गई!
- समय की बर्बादी: स्क्रू ड्राइवर से मिट्टी खोदने बैठेंगे तो दिन भर में एक ही गमला साफ होगा, जबकि खुरपी से वो काम 5 मिनट का था। परिणाम? प्रोजेक्ट्स हमेशा लेट होते हैं।
- मेहनत का कबाड़ा: जब एक पढ़ा-लिखा प्रोफेशनल खुद को ऐसे कामों में घिसते हुए देखता है, तो उसकी क्रिएटिविटी दम तोड़ देती है।
3. ऐसी कंपनी में रुकना = अपने भविष्य का कबाड़ा करना! (The Reality Check)
अगर आप भी किसी ऐसी जगह फंसे हैं और सोच रहे हैं कि "चलो, सैलरी तो मिल ही रही है, क्या फर्क पड़ता है?" तो ठहरिए! आप अपनी पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं:
- मार्केट वैल्यू हो जाएगी ज़ीरो (Zero Market Value): आज से दो साल बाद जब आप किसी अच्छी, प्रोफेशनल कंपनी में इंटरव्यू के लिए जाएंगे, तो वो आपसे आपकी पोजीशन के हिसाब से एडवांस डिज़ाइन, प्लानिंग और स्ट्रेटेजी के सवाल पूछेंगे। अगर आपने अपनी कंपनी में सिर्फ 'खुरपी चलाने' (हेल्पर वाला काम) का काम किया है, तो आपकी असली काबिलियत को जंग लग चुकी होगी। मार्केट आपको 'आउटडेटेड' मान लेगा।
- 'मल्टीटास्किंग' के नाम पर मानसिक शोषण: लाला कंपनियां इसे बहुत खूबसूरत नाम देती हैं—"हमारी कंपनी में तो सब ऑल-राउंडर हैं!" यह ऑल-राउंडर बनाना नहीं है, यह एक ही सैलरी में तीन लोगों का काम करवाकर पैसे बचाने की घटिया ट्रिक है, जो आपको मानसिक रूप से थका देती है।
निष्कर्ष: जब तक कारीगर अनाड़ी है, औजार टूटते रहेंगे
इस तरह की कंपनियों का मालिक अक्सर रोता हुआ मिलेगा कि "बिजनेस में प्रॉफिट नहीं हो रहा, समय पर प्रोजेक्ट पूरा नहीं हो रहा!" भाई साहब! प्रॉफिट कहाँ से होगा? आपने ड्राइंग बोर्ड पर बैठकर सिस्टम डिज़ाइन करने वाले एक्सपर्ट के हाथ में मिट्टी ढोने वाला तगाड़ी-फावड़ा थमा रखा है।
जो मैनेजमेंट एक सही टूल की कीमत और उसका सही उपयोग नहीं समझ सकता, वह कभी अपने एम्प्लॉई के भविष्य की कीमत नहीं समझेगा। ऐसे अनाड़ी कारीगरों के टूलबॉक्स का हिस्सा बनकर अपना भविष्य खराब करने से बेहतर है कि इंसान समय रहते संभल जाए, अपनी स्किल्स को अपग्रेड करे और ऐसी जगह तलाशे जहाँ पेंच और मिट्टी का फर्क समझा जाता हो।
आखिरी पेंच: टूल्स की कोई गलती नहीं होती, गलती उस अनाड़ी कारीगर (बॉस) की होती है जिसे पेंच और मिट्टी का फर्क नहीं पता। अगर आपके ऑफिस में भी आपका 'स्क्रू ड्राइवर' जैसा दिमाग खुरपी की तरह घिसा जा रहा है, तो समझ जाइए कि दलदल से बाहर निकलने का समय आ गया है!
आपकी क्या राय है? क्या आपने भी कभी किसी कंपनी में किसी क्वालिफाइड प्रोफेशनल को वो काम करते देखा है जो एक हेल्पर कर सकता था? क्या ऐसी कंपनियों में रुकना भविष्य खराब करना नहीं है? अपने विचार नीचे कमेंट्स में जरूर साझा करें!
Er. Krishankant
सौरदीक्षक
www.seac.in
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