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LA (Lighting Arrester / लाइटनिंग अरेस्टर) और ESE (Early Streamer Emission / ईएसई / अर्ली स्ट्रीमर एमिशन)

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सोलर प्लांट या किसी भी इमारत को आकाशीय बिजली (Lightning) के खतरे से बचाने के लिए लाइटनिंग अरेस्टर लगाना बहुत जरूरी होता है। बाजार में मुख्य रूप से दो तरह की तकनीक उपलब्ध हैं: कन्वेंशनल एलए (Conventional Lightning Arrester) और ईएससी / ईएसई (Early Streamer Emission - ESE) । ​सही सुरक्षा उपकरण चुनने के लिए दोनों के अंतर को समझना बेहद जरूरी है। ​कन्वेंशनल एलए और ईएससी (ESE) में मुख्य अंतर ​ 1. कार्य करने का तरीका (Working Principle) ​ कन्वेंशनल एलए: यह एक साधारण पैसिव (Passive) कॉपर या जीआई रॉड होती है। जब आकाशीय बिजली सीधे इसके ऊपर गिरती है, तब यह उसे सुरक्षित रूप से जमीन (Earthing) में भेज देती है। ​ ईएससी (ESE) एलए: यह एक एडवांस एक्टिव (Active) तकनीक है। आकाशीय बिजली गिरने से पहले ही जब हवा में आयनाइजेशन (Ionization) होता है, तो यह खुद आगे बढ़कर बिजली को आकर्षित (Streamer discharge) कर लेती है और उसे सुरक्षित रूप से ग्राउंड कर देती है। ​ 2. सुरक्षा का दायरा (Protection Radius) ​ कन्वेंशनल एलए: इसका कवरेज एरिया बहुत सीमित होता है। यह केवल 45 डिग्री के कोण (Cone ...

नए सोलर वेंडरों की सबसे बड़ी भूल: क्या अकेले पूरे प्रोजेक्ट का बोझ उठाना संभव है? (भाग-1)

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सोलर एनर्जी का सेक्टर आज देश भर में सबसे तेज़ी से उभरते व्यवसायों में से एक है। हर रोज़ नए युवा, इंजीनियर्स और तकनीशियन अपनी खुद की सोलर EPC या वेंडर फर्म शुरू कर रहे हैं। शुरुआत में उत्साह चरम पर होता है—सोलर पैनल्स की चमक, स्वच्छ ऊर्जा का विज़न और बिज़नेस में बेहतरीन मार्जिन की उम्मीद। ​लेकिन जैसे ही पहला या दूसरा कमर्शियल/रेसिडेंशियल ऑर्डर हाथ में आता है, ज़मीनी हकीकत सामने आने लगती है। ​नए सोलर वेंडर्स में अक्सर एक कॉमन पैटर्न देखने को मिलता है: "हर काम खुद ही करने की कोशिश करना।" ​साइट सर्वे से लेकर ग्राहक को कन्वेंस करना, कोटेशन तैयार करना, वेंडर से सामान का रेट तय करना, बैंक से फंड्स का इंतज़ाम करना, फिर साइट पर खुद खड़े होकर स्ट्रक्चर ठुकवाना, वायरिंग करना, डिस्कॉम (DISCOM) के दफ्तरों के चक्कर लगाना, और अंत में नेशनल पोर्टल पर सब्सिडी के डॉक्युमेंट्स अपलोड करना—सब कुछ एक ही व्यक्ति करने की कोशिश करता है। ​सवाल यह है: क्या वाकई एक सोलर प्रोजेक्ट का पूरा काम अकेले संभाला जा सकता है? ​आइए इस समस्या के हर पहलू को गहराई से समझते हैं। ​1. 'वन-मैन आर्मी...

समाज ही समाज को नुकसान पहुंचाता है: सोलर इंडस्ट्री का कड़वा सच

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आपने अक्सर ध्यान दिया होगा कि आज के दौर में सड़क पर चलते किसी जरूरतमंद मुसाफिर को लिफ्ट देने से पहले भी इंसान दस बार सोचता है। मन में पहला ख्याल सुरक्षा का आता है। ठीक यही स्थिति साधु-संतों, फकीरों या संन्यासियों को देखकर भी बनती है। कुछ ढोंगी और पाखंडी लोगों की करतूतों का नतीजा यह हुआ कि समाज का भरोसा सच्चे, ज्ञानी और निस्वार्थ संन्यासियों पर से भी उठने लगा है। धोखेबाज इंसानों की वजह से इंसानियत और अच्छाई पर से लोगों का यकीन कम होता जा रहा है। ​ठीक यही कड़वी सच्चाई आज हमारी सोलर इंडस्ट्री पर भी लागू होती है। सुनने में शायद थोड़ा अजीब लगे, लेकिन अगर आप गहराई से सोचेंगे, तो पाएंगे कि कुछ फर्जी और गैर-जिम्मेदार वेंडर्स की गलतियों की सजा आज पूरा सोलर समाज भुगत रहा है। ​ गलत इंस्टॉलेशन और बिगड़ती छवि ​जब कोई अकुशल या फर्जी वेंडर बिना सही शैडो एनालिसिस (Shadow Analysis) और बिना तकनीकी जानकारी के किसी ग्राहक के घर सोलर पैनल छायादार जगह पर लगा देता है, या घटिया क्वालिटी का सामान इस्तेमाल कर गलत वायरिंग कर देता है, तो नुकसान सिर्फ उस एक ग्राहक का नहीं होता। ​जब वह सिस्टम सही जनरेशन नहीं दे...

पीएम सूर्य घर योजना: सोलर वेंडर ने किया खराब काम या फ्रॉड? जानें कहाँ और कैसे करें ऑफिशियल शिकायत

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सोलर पैनल लगवाना एक बड़ा इन्वेस्टमेंट है और जब बात सब्सिडी वाले प्लांट की हो, तो कस्टमर को सही क्वालिटी और सर्विस मिलने का पूरा हक है। लेकिन क्या हो अगर नेशनल पोर्टल पर रजिस्टर्ड वेंडर घटिया सामान लगा दे, नेट-मीटरिंग में देरी करे, या इंस्टॉल करने के बाद आपकी कॉल उठाना बंद कर दे? ​अगर आप या आपका कोई कस्टमर ऐसी समस्या से जूझ रहा है, तो घबराने की जरूरत नहीं है। Ministry of New and Renewable Energy (MNRE) और नेशनल पोर्टल के सख्त नियम हैं, जिनके तहत आप दोषी वेंडर की शिकायत करके उस पर कार्रवाई करवा सकते हैं। ​आइए जानते हैं शिकायत दर्ज कराने के ऑफिशियल तरीके: ​ 1. पीएम सूर्य घर पोर्टल पर ऑनलाइन शिकायत दर्ज करें अगर आपने नेशनल पोर्टल के जरिए अप्लाई किया है, तो आपकी सबसे पहली और सीधी शिकायत पोर्टल पर ही दर्ज होगी: ​सबसे पहले आधिकारिक वेबसाइट pmsuryaghar.gov.in पर जाएं। ​अपने रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर से Consumer Login करें। ​डैशबोर्ड पर "Grievance / Helpdesk" या "Raise a Query" सेक्शन पर क्लिक करें। ​अपनी एप्लीकेशन आईडी चुनें और वेंडर के खिलाफ पूरी समस्य...

सोलर प्लांट लगवाते समय वेंडर (Vendor/Installer) से जरूर पूछें ये 10 सवाल

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जब आप अपने घर या बिजनेस के लिए सोलर सिस्टम लगवाने का फैसला कर लेते हैं, तो सबसे महत्वपूर्ण काम होता है एक सही और भरोसेमंद सोलर वेंडर चुनना। मार्केट में कई वेंडर्स अलग-अलग रेट्स और वादे करते हैं। ऐसे में सिर्फ कम कीमत देखकर ऑर्डर देना बाद में भारी पड़ सकता है। ​कोटेशन फाइनल करने और एडवांस पेमेंट देने से पहले अपने सोलर वेंडर से ये 10 जरूरी सवाल जरूर पूछें: ​1. मुझे कौन-कौन से कंपोनेंट्स दिए जा रहे हैं और उनकी वारंटी कितनी है? ​सोलर सिस्टम में मुख्य रूप से 5-6 जरूरी कंपोनेंट्स होते हैं। वेंडर से हर कंपोनेंट का ब्रांड और मॉडल स्पष्ट करवाएं: ​ सोलर मॉड्यूल (Solar Modules): क्या ये DCR (TopCon/Mono PERC) पैनल हैं? (परफॉर्मन्स वारंटी 25 साल और प्रोडक्ट वारंटी 10-12 साल है या नहीं?) ​ इन्वर्टर (Inverter): इन्वर्टर का ब्रांड क्या है और इसकी वारंटी कितने साल (5 साल या 10 साल) की है? ​ स्ट्रक्चर (Structure): स्ट्रक्चर का मटेरियल (HDG - Hot Dip Galvanized) और उसकी मोटाई/गेज क्या है ताकि हवा के दबाव को झेल सके? ​ केबल (DC & AC Cables): केबल कॉपर की है या एल्युमिनियम की? ...

C5, C10 और C20 रेटिंग क्या होती है? जानिए बैटरी का 'C-Rating' गणित और सही चुनाव

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सोलर और पावर बैकअप सिस्टम में सही बैटरी का चुनाव करते समय अक्सर आपके सामने C5, C10 और C20 जैसे शब्द आते हैं। साधारण भाषा में इन्हें बैटरी की C-Rating (Capacity Rating) कहा जाता है। ​सोलर चर्चा में अक्सर यह सवाल उठते हैं कि क्या केवल Ah (Ampere-Hour) देखकर बैटरी खरीदना सही है? जवाब है नहीं । C-Rating को अनदेखा करने पर बैटरी सही बैकअप नहीं दे पाती या जल्दी खराब हो जाती है। आइए सोलर चर्चा के इस ब्लॉग में आसान भाषा में समझते हैं कि C5, C10 और C20 रेटिंग क्या है, यह क्यों ज़रूरी है और इनमें क्या अंतर है। ​1. C-Rating क्या होती है और C5, C10, C20 का क्या मतलब है? ​C-Rating का मतलब होता है कि कोई बैटरी कितने घंटों में पूरी तरह से डिस्चार्ज (Discharge) होने के लिए डिज़ाइन की गई है। यहाँ 'C' का अर्थ Capacity (क्षमता) से है और उसके साथ लगा नंबर घंटों (Hours) को दर्शाता है। ​ C20 Rating: इसका मतलब है कि बैटरी को अपनी पूरी क्षमता (Ah) डिस्चार्ज करने में 20 घंटे का समय लगेगा। यह धीमी गति से डिस्चार्ज होने वाली बैटरी है। ​ C10 Rating: इसका मतलब है कि बैटरी को अपनी पूरी ...

सोलर पैनल को बहुत कम एंगल (Tilt Angle) पर लगाने के बड़े नुकसान: कम बिजली, पानी का जमाव और वारंटी खत्म होने का खतरा!

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नमस्कार दोस्तों, सोलर चर्चा में आपका स्वागत है। ​अक्सर जब घरों या व्यावसायिक जगहों पर ऑन-ग्रिड या ऑफ-ग्रिड सोलर सिस्टम लगाया जाता है, तो लोग सिर्फ पैनल की क्वालिटी और क्षमता पर ध्यान देते हैं। लेकिन एक बहुत ही महत्वपूर्ण तकनीकी पहलू को नजरअंदाज कर देते हैं— सोलर पैनल का झुकाव (Tilt Angle) । ​कई बार जगह बचाने, स्ट्रक्चर का खर्च कम करने या सही जानकारी न होने के कारण सोलर मॉड्यूल्स को बहुत कम एंगल (जैसे 0 से 5 डिग्री) पर या बिल्कुल फ्लैट लगा दिया जाता है। अगर आप भी ऐसा करने की सोच रहे हैं, या आपके वेंडर ने ऐसा किया है, तो सावधान हो जाइए! यह छोटी सी लापरवाही आपके पूरे सिस्टम को बर्बाद कर सकती है। ​आइए जानते हैं कि सोलर पैनल को बहुत कम एंगल पर लगाने से क्या-क्या बड़े नुकसान होते हैं: ​1. पानी और धूल का जमाव (Water Pooling & Dust Accumulation) ​सोलर मॉड्यूल के चारों तरफ एल्युमिनियम का एक फ्रेम होता है। जब पैनल को पर्याप्त झुकाव (Angle) नहीं मिलता, तो बारिश का पानी या सुबह की ओस पैनल के निचले हिस्से (फ्रेम के पास) में जमा होने लगती है। जब यह पानी सूखता है, तो वहां धूल-मिट...

आंधी और तूफान के मौसम में अपने सोलर सिस्टम की सुरक्षा कैसे करें?

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नमस्ते दोस्तों! ​जैसा कि हम जानते हैं कि अभी आंधी और तूफान का समय चल रहा है। तेज़ हवाएं, भारी बारिश और बिजली गिरना आपके सोलर पावर प्लांट के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। एक 'सौर ऊर्जा जागरूकता अभियान' (SEAC) के रूप में, हमारा उद्देश्य न केवल सोलर लगवाना है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि आपका सिस्टम हर मौसम में सुरक्षित और कुशल बना रहे। ​आज के इस ब्लॉग में हम उन महत्वपूर्ण सावधानियों के बारे में विस्तार से बात करेंगे, जिन्हें अपनाकर आप भारी नुकसान से बच सकते हैं। ​1. सोलर पैनल और माउंटिंग स्ट्रक्चर की जांच ​आंधी के दौरान सबसे ज्यादा खतरा पैनल के उड़ने या स्ट्रक्चर के हिलने का होता है। ​ नियमित टाइटनिंग: जांचें कि क्या सभी नट-बोल्ट ठीक से कसे हुए हैं। समय के साथ हवा के दबाव से ये ढीले हो सकते हैं। ​ फाउंडेशन की मजबूती: छत पर लगे सिविल वर्क या फास्टनर्स की जांच करें। यदि कहीं दरार दिखे, तो उसे तुरंत ठीक करवाएं। ​2. वायरिंग और केबल मैनेजमेंट ​तेज़ हवाएं खुले हुए तारों को नुकसान पहुँचा सकती हैं, जिससे शॉर्ट सर्किट का खतरा बढ़ जाता है। ​ केबल ड्रेसिंग: सुनि...

🌞सोलर बिजनेस कैसे शुरू करें: जीरो इन्वेस्टमेंट से लाखों की कमाई तक का पूरा रोडमैप🌞

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आज के समय में बिजली के बढ़ते दाम और सरकार की 'पीएम सूर्य घर' जैसी योजनाओं ने सोलर सेक्टर में अवसरों की बाढ़ ला दी है। कई लोग सोचते हैं कि सोलर बिजनेस शुरू करने के लिए लाखों का निवेश चाहिए, लेकिन सच यह है कि आप बिना एक भी रुपया खर्च किए (Zero Investment) भी इस शानदार करियर की शुरुआत कर सकते हैं। ​मैं कृष्णा (Seac Center - सोलर चर्चा विद कृष्णा) , एक NSDC सर्टिफाइड सोलर ट्रेनर और NCVT सर्टिफाइड सूर्यमित्र होने के नाते, आपको इस बिजनेस के वो सीक्रेट्स बताऊंगा जो आपको कोई और नहीं बताएगा। ​ 1. सोलर सेक्टर में बिजनेस के विभिन्न प्रकार ​सोलर में काम करने के कई तरीके हैं, आप अपनी रुचि और बजट के अनुसार चुन सकते हैं: ​ सोलर सेल्स और फ्रीलांसिंग (Zero Investment): इसमें आप ग्राहक और वेंडर के बीच की कड़ी बनते हैं। यह शुरू करने का सबसे आसान तरीका है। ​ सोलर डिजाइनिंग और कंसल्टेंसी: अगर आपको तकनीकी जानकारी है, तो आप प्रोजेक्ट डिजाइनिंग सर्विस दे सकते हैं। ​ सोलर इंस्टॉलेशन सर्विस (EPC): पूरी प्रोजेक्ट प्लानिंग से लेकर पैनल लगाने तक का काम। ​ सोलर मेंटेनेंस (O&M): पुर...

सोलर सिस्टम: सस्ता क्यों सस्ता है और महंगा क्यों भारी है?

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जब आप 3kW का ऑन-ग्रिड सिस्टम लगवाने निकलते हैं, तो बाजार में आपको कीमतों का बड़ा अंतर देखने को मिलता है। लेकिन याद रखिए, सोलर पैनल सिर्फ एक 'प्रोडक्ट' नहीं, बल्कि 25 साल का एक 'इन्वेस्टमेंट' है। ​1. सस्ता सिस्टम 'सस्ता' क्यों होता है? ​कम कीमत का मतलब अक्सर क्वालिटी और सुरक्षा से समझौता होता है: ​ हल्का स्ट्रक्चर: सस्ते वेंडर अक्सर 'Hot Dip Galvanized' लोहे के बजाय पतला या साधारण पेंट वाला लोहा इस्तेमाल करते हैं, जो तेज हवा में उड़ सकता है या कुछ ही सालों में जंग खाकर गिर सकता है। ​ पुरानी टेक्नोलॉजी के पैनल: कम कीमत में अक्सर Poly-crystalline या पुराने 'B-Grade' पैनल दे दिए जाते हैं, जिनकी बिजली बनाने की क्षमता कम होती है। ​ घटिया वायरिंग और सेफ्टी डिवाइस: DCDB/ACDB बॉक्स में घटिया क्वालिटी के स्विच और पतले तार लगाए जाते हैं, जिससे शॉर्ट-सर्किट या आग लगने का खतरा बना रहता है। ​ सर्विस का गायब होना: सस्ता बेचने वाला वेंडर अक्सर भविष्य में 'आफ्टर सेल्स सर्विस' नहीं दे पाता क्योंकि उसके पास मार्जिन ही नहीं होता। ​2. ज...

सोलर बिजनेस में 'Enquiry' तो आती है, पर 'Order' क्यों नहीं? जानिए कड़वे सच!

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सोलर सेक्टर आज तेज़ी पर है। हर घर की छत पर पैनल लग रहे हैं, लेकिन कई सोलर वेंडर्स और कंपनियों की एक ही शिकायत है— "ग्राहक बात तो करता है, कोटेशन भी लेता है, पर आखिर में ऑर्डर कन्फर्म नहीं करता।" ​14 साल के जमीनी अनुभव और मार्केट के उतार-चढ़ाव को देखने के बाद, मैं इसके सबसे बड़े और असली कारण आपके सामने रख रहा हूँ: ​ 1. रेट का मायाजाल: ₹1.80 लाख बनाम ₹2.10 लाख की जंग ​सबसे बड़ा खेल 'रेट' का है। मान लीजिए, एक बड़ी कंपनी ₹2,10,000 का रेट देती है, वहीं एक छोटा नया वेंडर उसी सिस्टम के लिए ₹1,80,000 मांगता है। ​ सच्चाई: ग्राहक को लगता है कि उसे ₹30,000 की सीधी बचत हो रही है। लेकिन वह यह नहीं देख पाता कि बड़ी कंपनी के पास स्टाफ है, ऑफिस है और एक सिस्टम है जो अगले 5-10 साल तक Service देने के लिए बना है। ​ नतीजा: एक छोटा वेंडर शायद ₹5,000 के मुनाफे पर काम कर ले, लेकिन कल को अगर सर्विस की ज़रूरत पड़ी, तो वह फोन उठाएगा या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं। ​ सीख: अगर आप बड़ी कंपनी हैं, तो ग्राहक को पैनल नहीं, 'भरोसा और 25 साल की शांति' बेचिए। उसे समझाइए कि...

सोलर रूफटॉप प्लांट में सस्ता सिस्टम क्यों बाद में महंगा पड़ जाता है?

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आजकल बिजली के बढ़ते बिलों से बचने के लिए बहुत से लोग सोलर रूफटॉप प्लांट लगवा रहे हैं। लेकिन सिस्टम लगवाते समय अधिकांश लोग सबसे पहले यही पूछते हैं – “सबसे सस्ता सिस्टम कितना लगेगा?” सस्ता सिस्टम उस समय तो अच्छा लगता है, लेकिन कई मामलों में वही सिस्टम आगे चलकर ज्यादा खर्च और परेशानी का कारण बन जाता है। आइए समझते हैं कि सस्ता सोलर सिस्टम आखिर कैसे महंगा पड़ सकता है। 1. कम गुणवत्ता वाले सोलर मॉड्यूल सस्ते सिस्टम में अक्सर लो ग्रेड या रिजेक्टेड सोलर मॉड्यूल लगाए जाते हैं। ऐसे मॉड्यूल में: पावर आउटपुट कम मिलता है जल्दी डिग्रेडेशन होता है कुछ सालों में प्रोडक्शन बहुत कम हो जाता है नतीजा – आपने जितनी बचत की उम्मीद की थी, उतनी बिजली बनती ही नहीं। 2. खराब क्वालिटी का इन्वर्टर इन्वर्टर सोलर सिस्टम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। सस्ते सिस्टम में कई बार: लो क्वालिटी या बिना ब्रांड के इन्वर्टर कम एफिशिएंसी जल्दी खराब होने की संभावना अगर इन्वर्टर खराब हो जाए तो पूरा प्लांट बंद हो जाता है। 3. घटिया स्ट्रक्चर और वायरिंग सस्ता सिस्टम लगाने के लिए कई बार इंस्टॉलर: पतला या कमजोर स्ट्रक्चर ...

बैंक की FD बनाम छत पर सोलर: ₹78,000 की सरकारी छूट के बाद कौन है असली विजेता?

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अक्सर लोग कहते हैं कि ₹2,20,000 बैंक में रख दें तो ब्याज से बिजली बिल भर देंगे। लेकिन जब से भारत सरकार ने 'पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना' के तहत भारी सब्सिडी का एलान किया है, तब से बैंक की FD इसके सामने कहीं नहीं टिकती। ​आइए, 3 किलोवाट (3kW) सोलर सिस्टम के ताज़ा गणित से समझते हैं। ​1. असली निवेश (The Net Investment) ​ 3kW सोलर सिस्टम की कुल लागत: ₹2,20,000 (लगभग) ​ सरकारी सब्सिडी (Direct Benefit): - ₹78,000 ​ आपका शुद्ध निवेश (Actual Cost): ₹1,42,000 ​अब तुलना बैंक में रखे उसी ₹1,42,000 से करते हैं जिसे आप FD करना चाहते थे। ​2. बैंक का गणित (₹1,42,000 पर) ​अगर आप अपनी जेब से लगने वाले इस ₹1,42,000 को बैंक में 7% की FD पर रखते हैं: ​ सालाना ब्याज: लगभग ₹9,940 ​ मंथली इनकम: केवल ₹828 ​ 5 साल का कुल ब्याज: ₹49,700 ​3. सोलर का गणित (₹1,42,000 के निवेश पर) ​एक 3kW का सोलर सिस्टम हर महीने करीब 360-400 यूनिट बनाता है, जिससे आपका ₹3,000 का मंथली बिल जीरो हो सकता है। ​ मंथली बचत: ₹3,000 ​ सालाना बचत: ₹36,000 ​ 5 साल की कुल बचत: ₹1,80,000 (...

क्या आप हर बार 'जीरो' से शुरू करने के लिए तैयार हैं? एक करियर की कहानी

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  अक्सर हमारे आसपास ऐसे लोग होते हैं जो एक काम शुरू करते हैं, और जैसे ही उसमें थोड़ी मेहनत या बोरियत आती है, उसे छोड़कर किसी दूसरी फील्ड में भाग जाते हैं। आज मैं आपको दो दोस्तों की कहानी सुनाता हूँ, जो शायद आपकी सोच बदल दे। दो दोस्तों की कहानी: रवि और सोहन आज से 12 साल पहले रवि और सोहन ने एक साथ सोलर इंडस्ट्री (Solar Industry) में अपना करियर शुरू किया। दोनों होनहार थे, लेकिन दोनों की सोच अलग थी।  * शुरुआत (0-3 साल): दोनों ने जमकर धूप में इंस्टॉलेशन का काम सीखा। रवि को लगा कि मेहनत ज्यादा है और तरक्की धीरे। उसने सुना कि प्रॉपर्टी (Real Estate) में बहुत मोटा कमीशन है। उसने सोलर छोड़ दिया और प्रॉपर्टी का काम शुरू कर दिया। सोहन टिका रहा और उसने सर्विस इंजीनियरिंग की बारीकियां सीखीं।   * मध्य सफर (4-8 साल): प्रॉपर्टी मार्केट में मंदी आई, तो रवि परेशान हो गया। उसने सोचा, "चलो बैंक में लोन एजेंट बन जाते हैं, वहां ऑफिस में बैठना होगा।" रवि फिर से जीरो पर आ गया। उधर सोहन ने सोलर में 3D डिजाइनिंग और कंसल्टेंसी सीख ली। अब उसे धूप में नहीं बैठना पड़ता था, लोग उसकी सलाह के पैसे देते थे।...

सावधान! क्या आपका सोलर एक्सपर्ट असली है या सिर्फ एक 'कमीशन एजेंट'?

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आजकल गली-नुक्कड़ पर हर दूसरा व्यक्ति 'सोलर एक्सपर्ट' बना घूम रहा है। कल तक जो LIC की पॉलिसी बेच रहे थे या प्रॉपर्टी के सौदे करवा रहे थे, आज वे सोलर पैनल हाथ में लेकर खड़े हैं। ​लेकिन क्या वे वाकई आपकी बिजली बचाने आए हैं, या सिर्फ अपना कमीशन बनाने? ​ 1. बिना जानकारी के "सोलर एक्सपर्ट" का बढ़ता चलन ​इमेज में जैसा दिखाया गया है, बहुत से लोग बिना किसी तकनीकी जानकारी (Technical Knowledge) के इस क्षेत्र में कूद पड़े हैं। उन्हें सोलर प्लेट की 'ABCD' तक नहीं पता, लेकिन एक लाइन उन्होंने रट ली है: "सर, आपका बिजली का बिल जीरो कर दूंगा!" ### 2. असली मकसद: सिर्फ और सिर्फ कमीशन इन तथाकथित सलाहकारों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके घर पर सोलर सिस्टम सही तरीके से लग रहा है या नहीं। उनका एकमात्र उद्देश्य अपना कमीशन सुरक्षित करना होता है। इसके लिए वे: ​ घटिया क्वालिटी (Vendor Kachra): सस्ते और लोकल वेंडर्स का माल बढ़िया बताकर बेच देते हैं। ​ गलत वादे: ऐसी बचत का वादा करते हैं जो तकनीकी रूप से संभव ही नहीं है। ​ आफ्टर सेल्स सर्विस का गायब होना: एक बार ...