सावधान! क्या आपके सोलर वेंडर ने भी आपको 'कमाई' का यह लालच दिया है?

आजकल घर पर सोलर पैनल लगवाना एक समझदारी का फैसला माना जाता है। इससे न सिर्फ बिजली का बिल जीरो होता है, बल्कि पर्यावरण को भी फायदा पहुंचता है। लेकिन जैसे-जैसे सोलर का मार्केट बढ़ रहा है, वैसे-वैसे कुछ वेंडर्स ग्राहकों को गुमराह करने के लिए एक नया पैंतरा अपना रहे हैं।


​अक्सर देखा जा रहा है कि अगर किसी ग्राहक की जरूरत 5 किलोवाट (kW) की है, तो वेंडर्स उनसे कहते हैं— "अरे सर! आप 5 क्यों, सीधे 10 किलोवाट लगवा लीजिए। जो एक्स्ट्रा बिजली बनेगी, उसे आप बिजली विभाग (जैसे MPPMCL / MP Discom) को बेच देना, सरकार आपको इसके बदले सीधे पैसे देगी!"

​ग्राहक भी इस लालच में आ जाता है कि चलो, घर की छत से ही मोटी कमाई शुरू हो जाएगी। लेकिन क्या वाकई ऐसा होता है? आइए आज इस 'कमाई के खेल' का सच जानते हैं।

​1. एक्स्ट्रा पैसे का सच: डिस्कॉम (Discom) पैसे नहीं, 'क्रेडिट' देती है

​सबसे बड़ा भ्रम यही है कि बिजली विभाग आपके बैंक अकाउंट में पैसे ट्रांसफर करेगा। असलियत यह है कि अधिकांश राज्यों में नेट मीटरिंग (Net Metering) के तहत काम होता है।

  • ​अगर आपकी सोलर यूनिट्स ने ज्यादा बिजली बनाई, तो वह ग्रिड में चली जाती है।
  • ​बिजली विभाग उस एक्स्ट्रा बिजली को आपके बिल में 'क्रेडिट' (Units Adjustment) के रूप में जोड़ देता है।
  • ​इसका मतलब यह है कि अगर किसी महीने (जैसे सर्दियों में) आपका सोलर कम चला या आपने रात में ज्यादा बिजली इस्तेमाल की, तो वह एक्स्ट्रा यूनिट्स वहां एडजस्ट हो जाएंगी।

​2. सेटलमेंट पीरियड का नुकसान

​हर डिस्कॉम का एक तय सेटलमेंट पीरियड (आमतौर पर मार्च का महीना या सितंबर) होता है। अगर साल के आखिर में भी आपकी बिजली बची रह जाती है, तो विभाग उसे बहुत ही कम दर (APPC - Average Power Purchase Cost) पर सेटल करता है, जो कि मात्र 2 से 3 रुपये प्रति यूनिट के आसपास हो सकती है,  सीधे तौर पर आपका नुकसान।

​3. भारी-भरकम इनिशियल कॉस्ट का फंसना

​सोचिए, 5 किलोवाट की जगह 10 किलोवाट लगाने पर आपकी शुरुआती लागत (Initial Capital) लगभग दोगुनी हो जाएगी।

  • ​जो पैसा आप कहीं और इन्वेस्ट कर सकते थे, वह आपकी छत पर ब्लॉक हो गया।
  • ​इस एक्स्ट्रा इन्वेस्टमेंट की रिकवरी (ROI) निकालने में ही आपको सालों लग जाएंगे, क्योंकि डिस्कॉम से मिलने वाला रिटर्न न के बराबर होता है।

​4. सब्सिडी का गणित

​सरकार सब्सिडी आपकी स्वीकृत लोड (Sanctioned Load) और वास्तविक जरूरत के आधार पर देती है। बेवजह बड़ा सिस्टम लगाने पर आपको मिलने वाली सब्सिडी का गणित भी बिगड़ सकता है और आपको अपनी जेब से ज्यादा पैसे लगाने पड़ेंगे।

​💡 सोलर चर्चा की सलाह: सही वेंडर और सही साइज कैसे चुनें?

  • बिल का आंकलन करें: पिछले एक साल के बिजली बिलों को देखें कि आपकी औसतन हर महीने की खपत (Units) कितनी है। 1 किलोवाट सोलर पैनल रोज लगभग 4 यूनिट बनाता है।
  • मंजूरी लोड (Sanctioned Load) देखें: आपका सोलर सिस्टम आपके घर के मंजूर लोड से ज्यादा का नहीं होना चाहिए, वरना डिस्कॉम से अप्रूवल मिलने में दिक्कत आएगी।
  • लालच में न आएं: सोलर का मुख्य उद्देश्य "बिजली का बिल बचाना" है, न कि "बिजली बेचना"। इसे एक बचत के साधन के रूप में देखें, कमर्शियल बिजनेस की तरह नहीं।

​निष्कर्ष

​सोलर लगवाना एक बेहतरीन निवेश है, बशर्ते वह आपकी जरूरत के मुताबिक हो। किसी भी वेंडर की बातों में आकर 'ज्यादा मुनाफे' के चक्कर में न पड़ें। अपनी जरूरत तय करें, सही सर्वे करवाएं और तभी सही क्षमता का सोलर प्लांट लगवाएं।

सतर्क रहें, सही चुनें!

सोलर से जुड़ी ऐसी ही सही और सटीक जानकारियों के लिए जुड़े रहिए Solar Charcha with Krishna (SEAC) के साथ।

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