सावधान! जान से बढ़कर कोई सोलर प्लांट नहीं: रायपुर हादसे से सबक
अगर एक सोलर इंस्टॉलर या हेल्पर को यही नहीं पता कि साइट पर सुरक्षा क्यों जरूरी है, जहाँ वह खड़ा है वहाँ क्या-क्या खतरे हो सकते हैं, और ज़रा सी लापरवाही का क्या नुकसान हो सकता है... तो ऐसी दुर्घटनाएँ होना तय है!
जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ अभी हाल ही में रायपुर (छत्तीसगढ़) के प्रोफेसर कॉलोनी में हुए उस दर्दनाक हादसे की, जिसने पूरे सोलर सेक्टर को झकझोर कर रख दिया है। एक घर की छत पर सोलर पैनल इंस्टॉल करते समय, सही जानकारी और सुरक्षा मानकों के अभाव के कारण, पैनल हैंडल कर रहे दो कर्मचारियों की पास से गुजर रही हाईटेंशन (HT) लाइन की चपेट में आने से मौके पर ही मौत हो गई।
इस खबर को सुनकर दिल दहल जाता है। लेकिन यहाँ एक बड़ा सवाल खड़ा होता है—आपको क्या लगता है, इस हादसे में किसकी गलती है?
- क्या उन मासूम कर्मचारियों की, जो सिर्फ अपना काम कर रहे थे?
- उस वेंडर या कंपनी की, जिसने उन्हें वहां भेजा?
- शासन-प्रशासन की, जिसने नियमों को कड़ा नहीं किया?
- या उस मकान मालिक (ग्राहक) की, जिसने अपने घर पर सोलर लगवाया?
गलती किसकी? आइए गहराई से समझें
अगर हम सच कड़वा भी हो तो स्वीकार करें, तो सबसे बड़ी गलती इंजीनियरिंग, वेंडर मैनेजमेंट और ट्रेनिंग की कमी की है।
- क्या इंस्टॉलर्स की गलती थी? ज़मीनी हकीकत यह है कि फील्ड पर काम करने वाले कई हेलपर्स और नए तकनीशियनों को LT (Low Tension) और HT (High Tension) लाइन का अंतर ही नहीं पता होता। उन्हें यह नहीं मालूम होता कि HT लाइन का मैग्नेटिक फील्ड इतना खतरनाक होता है कि वह बिना छुए भी एल्युमिनियम फ्रेम वाले सोलर पैनल को अपनी तरफ खींच (Arcing) सकता है। जब उन्हें सिखाया ही नहीं गया, तो उन्हें दोषी कैसे ठहराएं?
- वेंडर और कंपनी की जवाबदेही: साइट पर काम शुरू करने से पहले साइट सर्वे (Site Survey) और हैजर्ड असेसमेंट (Hazard Identification) करना पूरी तरह वेंडर की जिम्मेदारी है। क्या कंपनी ने साइट पर सेफ्टी सुपरवाइजर भेजा? क्या काम शुरू करने से पहले 'टूलबॉक्स टॉक' (सुरक्षा ब्रीफिंग) हुई? क्या उन कर्मचारियों के पास सर्टिफाइड इलेक्ट्रिकल इंसुलेटेड ग्लव्स और बिना मेटल वाले सेफ्टी शूज थे? अगर नहीं, तो यह सीधे तौर पर वेंडर की लापरवाही है।
- शासन और ग्राहक की भूमिका: प्रशासन को सोलर कंपनियों के लिए सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य करना होगा। वहीं, सोलर लगवाने वाले ग्राहकों को भी यह समझना होगा कि कम दाम के चक्कर में ऐसे अनट्रेंड वेंडर्स को काम न दें जो सुरक्षा उपकरणों से समझौता करते हैं।
सोलर सेक्टर के लिए 3 सबसे जरूरी सुरक्षा नियम
एक जिम्मेदार सोलर प्रोफेशनर होने के नाते, मेरा यह मानना है कि हर साइट पर इन 3 बातों को पत्थर की लकीर बना लेना चाहिए:
- फासला ही सुरक्षा है (Safe Distance): अगर छत के पास से 11kV या 33kV की HT लाइन गुजर रही है, तो उससे कम से कम 10 से 15 फीट की दूरी होना अनिवार्य है। अगर दूरी कम है, तो बिना बिजली विभाग से शटडाउन लिए या लाइन को री-रूट कराए काम शुरू कतई न करें।
- रबर ग्लव्स और सेफ्टी शूज का गणित: मानव शरीर बिजली का सुचालक (conductor) है। सर्टिफाइड रबर ग्लव्स करंट के रास्ते को रोकते हैं, और रबर सोल वाले सेफ्टी शूज पैर और जमीन के बीच इंसुलेशन बनाकर 'अर्थिंग सर्किट' को पूरा होने से रोकते हैं। ये केवल नियम नहीं, जान बचाने वाले कवच हैं।
- पैनल हैंडलिंग की ट्रेनिंग: हवा के झोंकों या संकरी छतों पर एल्युमिनियम फ्रेम वाले सोलर पैनल पतंग की तरह बर्ताव करते हैं। ज़रा सा संतुलन बिगड़ा और पैनल बाहर की तरफ गया, तो वह सीधे तारों से टकरा सकता है। कर्मचारियों को इसे संभालने का सही तरीका पता होना चाहिए।
आखिरी बात: स्किल के साथ 'सेफ्टी' भी जरूरी है
हम देश को रिन्यूएबल एनर्जी (Clean Energy) की तरफ ले जा रहे हैं, जो कि बहुत गर्व की बात है। लेकिन यह तरक्की किसी कर्मचारी के खून से नहीं लिखी जानी चाहिए। जब तक हम अपने युवाओं को हुनर (Skill) देने के साथ-साथ सुरक्षा (Safety) की पूरी ट्रेनिंग नहीं देंगे, तब तक ऐसे हादसों को रोक पाना नामुमकिन होगा।
पैसा कमाया जा सकता है, सोलर प्लांट दोबारा लगाया जा सकता है, लेकिन किसी के घर का चिराग बुझ जाए तो उसे वापस नहीं लाया जा सकता। अगली बार जब भी किसी साइट पर काम शुरू करें, पहले सुरक्षा सुनिश्चित करें।
सुरक्षित रहें, सजग रहें!
आपको क्या लगता है, इस तरह के हादसों को रोकने के लिए कंपनियों और प्रशासन को क्या कड़े कदम उठाने चाहिए? अपने विचार कमेंट में जरूर साझा करें।
Er. Krishankant
आपका सौरदीक्षक
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