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एक सफल ट्रेनर वो नहीं जो खुद को बड़ा दिखाए, बल्कि वो है जो सामने वाले को छोटा महसूस न होने दे!

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ट्रेनिंग या पब्लिक स्पीकिंग के क्षेत्र में एक बहुत ही बारीक, लेकिन बेहद गंभीर गलती अक्सर देखने को मिलती है। कई बार जब कोई ट्रेनर या स्पीकर मंच पर आता है, तो वह अपनी बात रखने से ज्यादा अपनी एक 'भारी-भरकम' छवि बनाने में लग जाता है। भारी अंग्रेजी, कठिन तकनीकी शब्द, अपनी डिग्रियों का रौब और अपनी सफलताओं का ऐसा दिखावा... जिससे सामने बैठी ऑडियंस प्रभावित होने के बजाय सहम जाती है। ​यदि आपके मंच से उतरने के बाद सामने बैठे लोग यह सोचने लगें कि— "सर तो कोई असाधारण इंसान हैं, हम तो बहुत साधारण हैं, हम इनके जैसा कभी नहीं बन सकते" —तो समझ जाइए कि एक ट्रेनर के रूप में आप उस दिन असफल रहे हैं। ​क्योंकि आपका मकसद उन्हें अपनी महानता दिखाना नहीं, बल्कि उनके भीतर छुपी काबिलियत को जगाना था। ​भारी-भरकम छवि का नुकसान: इंस्पिरेशन या डिमोटिवेशन? ​जब हम खुद को पहुँच से बाहर (Inaccessible) बना लेते हैं, तो सामने बैठा व्यक्ति हीन भावना (Inferiority Complex) का शिकार हो जाता है। वह नकारात्मक हो जाता है। उसे लगने लगता है कि यह मुकाम हासिल करना उसके बस की बात ही नहीं है। ​एक सच्चे...